Wednesday, May 13, 2020

LOCKDOWN (तालाबंदी)

लॉकडाउन (तालाबंदी)
                ‘‘लॉकडाउन’’ शब्द वह शब्द है, जिससे दुनियां का हर वर्ग, हर व्यक्ति, सभी इस शब्द से परिचित है अगर कोई व्यक्ति आज इस शब्द से परिचित न हो तो इस शब्द का अपमान करना होगा। लॉकडाउन को अगर एक सरल तरीके से समझे तो इसका मतलब है कि ‘‘खुद को घर में कैद करना’’ लॉकडाउन शब्द की उत्पत्ति सुपर पावर अमेरिका के 9/11 हमले के बाद से हुई जब अमेरिका में आपातस्थिति होने पर पहली बार 3 दिन का लॉकडान किया गया था। 

               इसके बाद 2005 में न्यू साउथ वेल्स (ऑस्ट्रेलिया) ने पुलिस दंगा रोकने के लिए लॉकडादन किया था, 19 अप्रैल 2013 को बोस्टन शहर (इरान) को आतंकियों की खोज के लिए लॉकडाउन कर दिया गया था, उसके बाद नवम्बर 2005 में पैरिस हमले के बाद संदिगग्धों को पकड़ने के लिए साल 2015 में ब्रसेल्स में पूरे शहर को लॉकडाउन किया गया था। और आज देश कोविड-19 महामारी से बचने के लिए लॉकडाउन का उपयोग कर रहा है। 
लॉकडाउन के प्रभाव: 
जिस इलाके में लॉकडाउन किया जाता है उसे क्षेत्र के लोगों को घर से बाहर निकलने की अनुमति नही होती है। 
उन्हें सिर्फ दवा और खाने -पीने जैसी जरुरी चीजों की खरीदारी के लिए ही बाहर आने की इजाजत मिलती है इस दौरान वे बैंक से पैसे निकाल सकते हैं। 
- अगर लॉकडाउन की वजह से किसी तरह की परेशानी हो तो आप संबंधित पुलिस थाने, जिला कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक अथवा अन्य उच्च अधिकारी को फोन कर सकते हैं। 
- यह सरकार द्वारा अपनाई गई अस्थाई व्यवस्था होती है। यह ब्नतमिू से बिलकुल अलग होती है। 
- लोक डाउन से समाज पर इसके व्यापक प्रभाव होते हैं जैसे - सामाजिक आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक आदि।
- रोजगार बन्द होने से जहां लोगों को आर्थिक समस्या का सामना करना पड़ता है तो वहीं मंदिर, मस्जिदों में आवाजाही से उनके धार्मिक अनुष्ठानों पर प्रभाव पड़ता है। 
- राजनैतिक समस्याऐं भी विकराल रूप ले लेती है, इलेक्शन का ना हो पाना, लोक नियुक्ति ना हो पाना, संसद का कार्य सुचारु रूप से ना चल पाना। 
- शिक्षा व्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव 
- पुराने असाध्य रोगों से लड़ रहे मरीजों के उपचार में विलंब होना इत्यादि। 

Saturday, May 2, 2020

प्लासी का युद्ध (23 जून 1757) (battle of plassey)


प्लासी का युद्ध (23 जून 1757)



o   अंग्रेज अपनी साम्राज्यवादी नीति के तहत ऐसे अवसर की तलाश में ही थे और उन्होंने घसीटी बेगम गुट को समर्थन कर दिया।
o   पहले से निर्धारित नीति के तहत सभी प्रमुख पदाधिकारियों ने युद्ध में विश्वासद्यात किया। एक छोटी-सी झडप के बाद सिराज परास्त हुआ।
o   इस संघर्ष में सिराज के दो विश्वसनीय सेनापति मीर मदान मोहन लाल वीरता पूर्वक लड़े मारे गये।
o   युद्ध मैदान से सिराज भाग गया किन्तु मीर जाफर के पुत्र मीरान ने उसकी हत्या कर दी।
o   पणिक्कर- ‘यह युद्ध नहीं विश्वास घात था
o   नवीन चन्द्र सेन- ‘भारत के लिए शास्वत दुःख की काली रात का आरंभ
o   कलकत्ता के किले पर आक्रमण के समय ब्लैकहोल (काल कोठरी) की घटना का उल्लेख केवल हॉलवैल द्वारा किया गया। उसके अनुसार एक अंधोरी कोठरी में 146 अंग्रेजों को बंदी बनाया गया जिसमें मात्र 23 ही जीवित बच सके।
o   सिराज के समय कलकत्ता का गवर्नर ड्रेन्स था ओर कासिम बाजार की कोठी का प्रधाान वॉटसन था।
प्लासी के युद्ध के परिणाम
o   अब बंगाल का नवाब अंग्रेजों की कठपुतली मात्र बनकर रह गया।
o   इसने अंग्रेजों का बंगाल पर कब्जा तो नहीं हुआ किन्तु उन्हें नवाब द्वारा इच्छानुसार अधिाकार मिल गया।
o   मीर जाफर का नवाब बनाया जानाप्रथम क्रांतिकहीं गई।
o   जदुनाथ सरकार के अनुसार 23 जून 1757 को मध्य युग को अन्त हो गया और आधाुनिक युग का शुभारम्भ हुआ।
मीर जाफर
o   सिराज के मीर बक्शी मीर जाफर को अंग्रेजों ने कठपुतली नवाब के रूप में नियुक्त किया और उसने अंग्रेजों को निम्नलिखित सुविधाए प्रदान की-
-                      बंगाल, बिहार उड़ीसा में अंग्रेजों को मुक्त व्यापार की इजाजत 24 परगना की जमींदारी।
-                      फ्रांसीसी अधिपत्य की सभी बस्तियाँ अंग्रेजों को दे दी गई।
-                      जाफर ने क्लाइव को निजीतौर पर 5 लाख रु- और कलकत्ता के दक्षिण में एक जागीर प्रदान की जिसे क्लाइव की जागीर कहा जाता है।
o   जाफर को क्लाइव का गीदड़ कहा गया (क्लाइव का गधा)
o   तदोपरान्त जाफर को यह लगने लगा कि अंग्रेज केवल अपना भला चाहते है ओर वे किसी भी तरह बंगाल के हित में नहीं है।
o   जाफर ने डचों फ्रांसीसियों के साथ संपर्क बढ़ाना शुरू किया ओर संभवतः डचों के साथ मिलकर अंग्रेजों को सिकस्त देने का प्रयास किया। किन्तु क्लाइव के नेतृत्व में 1759 मेंबेदारा के युद्धमें डचों को निर्णायक पराजय मिली।
o   अंग्रेजी हस्तक्षेप के कारण वह दीवान राय दुर्लभ तथा बिहार के उप-गवर्नर राम नारायण को दण्डित कर सका।
o   अंततः अंग्रेजों ने जाफर पर बकाया राशि (25 लाख) ने देने के आरोप में उसे गद्दी छोड़ने हेतु बाध्य किया।
मीर कासिम
o   सर्वप्रथम कासिम ने कार्यकारी गवर्नर हालवैल के साथ एक समझौता किया जिसके अनुसार बर्दमान, मिदनापुर चटगांव की जमीदारी अंग्रेजों को मिली।
o   अंग्रेजों को दक्षिण युद्धों के लिए पाँच लाख रु- शोरे तथा चूने के व्यापार में रियायत।
o   गवर्नर वेन्सिटार्ट ने 1760 को अंग्रेजों के लिए क्रांति कहा क्योंकि कासिम के नवाब बनने से उसके अनुसार अंग्रेजों की स्थिति में व्यापक परिवर्तन आए।
सुधार परिवर्तन
o   1762 में कासिम ने अपनी राजधानी मुर्शिदा बाद से मुंगेर स्थाानान्तरित की नवाब बनने से पहले वह पूर्णिया रंगपुर का फौजदार रह चुका था अतः उसे प्रशासनिक अनुभव भी था।
o   इसने अपनी सेना का पुनर्गठन किया तथा तोप बंदूक का कारखाना मुंगेर में स्थापित कराया।
o   राजस्व के सुदृढ़ीकरण के लिए उसने अतिरिक्त कर के रूप मेंखिजरी जामालगाया।
o   अंग्रेजों के दस्तक के दुरूपयोग को रोकने के लिए उसने आंतरिक व्यापार को भी कर मुक्त कर दिया जिसमें दस्तक की प्रासंगिकता ही समाप्त कर दी।
संघर्ष
o   वेरलेस्ट के अनुसार मीर कासिम से अंग्रेजों के झगड़े का मूल कारण कासिम की राजनैतिक महत्वकांक्षा थी जबकि तात्कालिक कारण आन्तरिक व्यापार था।
o   वास्तव में अंग्रेजों की स्वच्छता तथा दस्त के दुरूपयोग पर कासिम द्वारा रोक ही संघर्ष का मुख्य कारण बनी।
o   अंग्रेजों द्वारा संरक्षित अधिकारी राम नरायण को पहले उसने नौकरी से हटा दिया फिर हत्या करा दी।



Friday, May 1, 2020

केंद्रीय सचिवालय (central secretariat)

केंद्रीय सचिवालय 

केंद्रीय सचिवालय में केंद्र सरकार के सभी मंत्रालय और विभाग शामिल हैं। अर्थात् प्रशासन की दृष्टि से केंद्र सरकार विभिन्न मंत्रालय और विभागों में विभक्त हैं। केंद्रीय सचिवालय ऐसे सभी मंत्रालयों  और विभागों की समष्टि है। एक मंत्रालय में सामान्यतः दो से चार विभाग होते हैं, किंतु किसी किसी मंत्रालय में कोई विभाग नहीं होता, जैसे- विदेश मंत्रलय। इसी प्रकार कुछ ऐसे विभाग भी हैं जिन्हें किसी मंत्रालय के अधीन नहीं रखा गया है, जैसे- परमाणु ऊर्जा विभाग। मंत्रालयों और विभागों के राजनीतिक प्रमुख मंत्रीगण तथा प्रशासनिक प्रमुख सचिवगण होते हैं।


मंत्रालय की संरचनाः

केंद्र सरकार के मंत्रालय विशेष की संरचना तीन स्तरीय है-

1- एक राजनीतिक प्रमुख अर्थात कैबिनेट मंत्री जिसकी सहायतार्थ राज्यमंत्री और उपमंत्री होते हैं। किंतु कभी कभी राज्यमंत्री भी स्वतंत्र प्रभार में मंत्रालय/विभाग का राजनीतिक प्रमुख होता है।
2- सचिव की अध्यक्षता में सचिवालय संगठन/सचिव लोक सेवक होता  है। सचिव  के सहायातार्थ संयुक्त सचिव, उपसचिव, अवर सचिव और अन्य कर्मचारी होते हैं। इस प्रकार, सचिवालय-संगठन में दो विशेष घटक-अधिकारी और कार्यालय_ कर्मचारियेां को निर्देशित और नियंत्रित करने के लिए तथा लिपिकीय कार्य को निष्पादित करने के लिए होते हैं,
3- विभाग-प्रमुख की अध्यक्षता में कार्यकारी संगठन होता है। इन विभाग प्रमुखों को विभिन्न पदनामों, जैसे-निदेशक, महानिदेशक, आयुक्त, महानिरीक्षक, मुख्यनियंत्रक आदि के नाम से जाना जाता  है।
सचिवालय के अधिकारी/कर्मचारी 
सचिवालय के अधिकारियों/कर्मचारियों का वर्तमान पदक्रम इस प्रकार है-

  • सचिव - अपर सचिव
  • संयुक्त सचिव - निदेशक
  • उप-सचिव - अवर सचिव

उपर्युक्त में से प्रथम तीन पदक्रम के अधिकारी ‘उच्च श्रेणी के प्रबंधन’ का कार्य तथा अंतिम तीन पदक्रम के अधिकारी ‘मध्यम श्रेणी के प्रबंधन’ का कार्य देखते हैं। ये सभी अधिकारी अपने स्तर पर कार्यो का निपटान करते हैं तथा महत्वपूर्ण विषयों को उच्च अधिकारी  के समक्ष प्रस्तुत करते हैं। इसके अतिरिक्त, ये सब अधिकारी भारत सरकार के हित को ध्यान में रखकर अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हैं। इसीलिए सचिव को सचिव, भारत सरकार के रूप में पदनामित किया गया है, न कि संबद्ध मंत्री/मंत्रालय के सचिव के रूप में।

सचिव की भूमिकाएँ निम्नलिखित हैंः

  1. वह मंत्रलय/विभाग पर प्रशासनिक प्रमुख होता है। इस संदर्भ में उसकी जिम्मेदारी पूर्ण और विभाजित हैं।
  2. (ह नीतिगत  और प्रशासनिक मामलों के सभी पहलुओं पर मंत्री का प्रमुख सलाहकार होता है।
  3. वह, संसदीय लोक लेखा समिति के समक्ष अपने मंत्रलय/विभाग का प्रतिनिधित्व करता है।

         अपर सचिव किसी विभाग अथवा विभाग के किसी स्कंध (विंग) का प्रभारी होता है। दूसरी ओर, संयुक्त सचिव किसी विभाग के स्कंध का प्रभारी होता है। संयुक्त सचिव का दर्जा और वेतन अपर सचिव यदि किसी विभाग का प्रभारी नहीं है तो कोई अधिक अंतर नहीं है। केंद्र सरकार के पुनर्गठन पर रिचर्ड टोटनहम की रिपोर्ट (1945) में यह उल्लेख है कि अपर सचिवों और संयुक्त सचिवों को न ही सस्ता सचिव और न ही अधिक खर्चीला उपसचिव होना चाहिए।
        अपर सचिव किसी विभाग अथवा विभाग के किसी स्कंध (विंग) का प्रभारी होता है। दूसरी ओर, संयुक्त सचिव किसी विभाग के स्कंध का प्रभारी होता है। संयुक्त सचिव का दर्जा और वेतन अपर सचिव यदि किसी विभाग का प्रभारी नहीं है तो कोई अधिक अंतर नहीं है। केंद्र सरकार के पुनर्गठन पर रिचर्ड टोटनहम की रिपोर्ट (1945) में यह उल्लेख है कि फ्अपर सचिवों और संयुक्त सचिवों को न ही सस्ता सचिव और न ही अधिक खर्चीला उपसचिव होना चाहिए।


अमेरिकी क्रांति (american revolution)

अमेरिकी क्रांति
          अठारहवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध पश्चिमी दुनिया- अमेरिका और यूरोप- में क्रांति का काल था। अमेरिकी क्रांति उन घटनाक्रमों में एक अत्यन्त महत्वपूर्ण कदम था जिसने 1500 ई- से चली आ रही सरकार की निरंकुश विचारधारा को मार गिराकर पश्चिमी यूरोप में राजनीतिक ढांचे को बदल डाला। अपने बगावत को उचित ठहराने तथा नयी राजनीतिक संस्थाओं को निर्धारित करने के अमेरिकियों के निर्भीक प्रयोग अन्य देशों के लिए प्रेरणास्रोत और आदर्श साबित हुए। अपने सही परिप्रेक्ष्य में, अमेरिकी क्रांति आधुनिक विश्व इतिहास की महान घटनाओं में एक थी।



अमेरिकी औपनिवेशिक समाज
          अमेरिकी क्रांति एक जटिल आन्दोलन था। 1776 ई- के पूर्व डेढ़ सौ साल के दौरान अमेरिकी समाज ब्रिटिश और यूरोपीय समाजों से भिन्न और अलग हो चुका था। 1776 ई- के बहुत पहले ही अमेरिका में स्वतंत्र होने की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी थी, क्रांति तो इस प्रक्रिया की परिणति थी। 1776 ई- में यूरोप से भिन्न दुनिया में अमेरिकियों के रहने का सबसे स्पष्ट लक्षण था- उनकी जीवन्त अर्थव्यवस्था जो अमेरिका के बीहड़ों में विकसित हुई। औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ विविधतापूर्ण कृषि व्यवस्था थी- न्यू इंग्लैण्ड और मध्यवर्ती उपनिवेशों में छोटे और व्यक्तिगत फार्म थे तो दक्षिण में बड़े-बड़े बगान, जिनमें गुलामों द्वारा खेती करवायी जाती थी।
          अमेरिकावासियों ने वाणिज्यि और उद्योग की भी अवहेलना नहीं की। न्यू इंग्लैण्ड और मध्यवर्ती उपनिवेशों के व्यापारियों ने अमेरिका के अन्दर उन्नतिशील व्यवसाय विकसित किया। उन्होंने समुद्र पार ग्रेट-ब्रिटेन, वेस्ट इंडिज और यूरोपीय देशों के साथ भी व्यापार किया। 1776 ई- तक उपनिवेशवासी ब्रिटिश विरोध के बावजूद तैयार माल का उत्पादन करने लगे थे। न्यू इंग्लैण्ड में वेस्ट इण्डियन सीरा से रम बनाकर असख्ंय व्यापारियों ने अपार धन कमाया। एक उन्नतिशील जहाजरानी उद्योग भी स्थापित हो चुका था।
         1776 ई- में अमेरिका की जनसंख्या (2,500,000) ब्राह्य रूप से ग्रेट-ब्रिटेन की तरह ही वर्ग संरचना में संगठित थी। धनी सौदागरों और बगान-मालिकों का अभिजात-वर्ग, जो आर्थिक जीवन, राजनीति, धर्म और तौर-तरीकों पर हावी था, अपनी स्थिति के बारे में जागरूक था और उसे बनाए रखना चाहता था। स्वतंत्र किसानों, दुकानदारों, कारीगरों और व्यवसायी लोगों के एक विशाल उद्यमशील समुदाय का स्थान अभिजात वर्ग के नीचे था। कुछ दैनिक मजदूर, रैयती किसान और बंधुआ नौकर भी थे जिनका समाज में और नीचे स्थान था। फिर हब्शी गुलाम भी थे।
          औपनिवेशिक अभिजात परिवारों की वंश-परम्परा की जड़ें यूरोप में नहीं मिलतीं। अमेरिकी अभिजाततंत्र रक्त पर नहीं, बल्कि सम्पत्ति पर आधारित थी। निचले वर्ग के उद्यमी और सौभाग्यशाली लोगों के लिए परिश्रम से प्राप्त ऐश्वर्य द्वारा अभिजात वर्ग का दर्जा प्राप्त करना सम्भव था।
          नयी और पुरानी दुनिया के बीच संभवतः सबसे तीक्ष्ण अन्तर राजनीतिक जीवन में था। यों तो प्रत्येक अमेरिकी उपनिवेशों की अपनी-अपनी सरकार थी, परन्तु यह सामान्य पैटर्न 1776 ई- तक विकसित हुआ था। हर उपनिवेश का एक गवर्नर होता था, जो ब्रिटिश राजमुकुट की सत्ता का प्रतिनिधित्व करता था और सामान्यतः ब्रिटिश राजमुकुट द्वारा चुना जाता था। पेनसिलवानिया को छोड़कर हर उपनिवेश में दो सदनों की विधायिका थी। निचला सदन सम्पत्तिशाली लोगों द्वारा चुना जाता था, जबकि ऊपरी सदन के सदस्यों का मनोनयन ब्रिटिश नरेश या गवर्नर द्वारा होता था।
          उपनिवेशवासियों में यह भावना घर करती जा रही थी कि औपनिवेशिक सरकारों का उतना ही महत्व है जितना कि ब्रिटिश सरकार का। डेढ़ सौ साल के स्वशासन के अनुभव ने ग्रेट ब्रिटेन और उपनिवेशों के बीच अटलाण्टिक से भी बड़ी खाई पैदा कर दी थी। औपनिवेशिक धार्मिक जीवन अनूठा था। यद्यपि वे ऐसे चर्च को खर्च चलाने के लिए कर देते थे जो प्रायः असहिष्णु और अधिनायकीय थे, परन्तु इन उपनिवेशों में यूरोपीय देशों की तुलना में कहीं अधिक धार्मिक स्वतंत्रता थी।
          1776 ई- के पहले उपनिवेशवासी सांस्कृतिक गतिविधियों में कम रूचि लेते थे। अमेरिकियों ने औपनिवेशिक समाज में जीविका प्राप्त करने के लिए कॉलेजों और स्कूलों की स्थापना अवश्य की। कई क्षेत्रें में समाचारपत्रें का भी प्रकाशन शुरू हुआ। अमेरिकी वास्तु-शिल्पीय शैली का सूत्रपात हुआ, लेकिन साहित्य और कला के क्षेत्र में ऐसी कोई प्रगति नहीं हुई जो उल्लेखनीय हो। संक्षेप में, औपनिवेशिक सांस्कृतिक जीवन अब भी यूरोप से जुड़ा था।
          1776 ई- तक अमेरिकी और ब्रिटिश समाज के बीच काफी मतभेद पैदा हो चुके थे, लेकिन इस मतभेद के कारण क्रांति नहीं हुई है। अधिकांश अमेरिकी अब भी अंग्रेज थे और यूरापीय परम्परा से निकट से जुड़े हुए थे। उनका आर्थिक विचार, उनकी राजनीतिक व्यवस्था, उनका धर्म और उनकी सामाजिक विचारधारा मूलतः यूरोपीय थी। यद्यपि वे नए वातावरण में घुलमिल चुके थे, लेकिन उनका रूपान्तर नए रूप में नहीं हुआ था। उनका विद्रोह इस दृढ़ धारणा से प्रेरित था कि ब्रिटेन उस परम्परा का उल्लंघन कर रहा है। जिसे उपनिवेशवासियों ने उन्हीं से विरासत में प्राप्त किया था। अमेरिकी क्रांति अमेरिकियों द्वारा यूरोप से संबंध विच्छेद करने का उदाहरण नहीं था, यह अमेरिकीयों द्वारा यूरोप की सबसे कीमती और सबसे उच्च विचारधारा को व्यवहार रूप से परिणत करने का उदाहरण था, ताकि वे उस अमेरिका समाज को दिए गए आश्वासन को पूरा कर न सके जिसका उन्होनें बीजारोपण और पोषण किया था।
ग्रेट ब्रिटेन के साथ संघर्ष
          औपनिवेशिक समाज की विक्षुब्धता की जितनी कम समझ अठारहवीं सदी के ग्रेट ब्रिटेन में थी उतना शायद ही कहीं और। समुद्र पार के उपनिवेशों में ब्रिटिश स्वार्थ मुख्यतः आर्थिक था। सच्चे वाणिज्यवादी ढंग में शासक वर्ग कायल था कि ब्रिटिश सम्पन्नता और शक्ति औपनिवेशिक स्रोतों के शोषण पर निर्भर करती है। औपनिवेशिक संबंधों में निहित मानवीय तत्वों की ओर बहुत कम ध्यान दिया गया। अपने उपनिवेशों के प्रति ग्रेट ब्रिटेन की नीति जहाजरानी कानूनों की श्रृंखला से स्पष्ट होती है, जो यह अपेक्षा करती थी कि उपनिवेशों में उत्पादित कुछ वस्तुएं केवल ब्रिटेन को ही बेची जाएं, उपनिवेशवासी सिर्फ ब्रिटेन से ही बना तैयार माल खरीदें और सभी माल ब्रिटिश या औपनिवेशिक जहाजों में ही ढोया जाये। ब्रिटेन का उद्देश्य एक बन्द और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था का निर्माण करना था।
          कई वर्षों से ब्रिटेन अपनी औपनिवेशिक नीति को लागू करने में अत्यन्त लापरवाह था। सप्तवर्षीय युद्ध ने वर्षों की अहवहेलना को दुरूस्त करने के लिए और सुधार-कार्यक्रमों को लागू करने की प्रेरणा दी। 1763 ई- के बाद ग्रेट ब्रिटेन की चिन्ता का मुख्य विषय था- उपनिवेशों की सुरक्षा, युद्ध का कर्ज और उपनिवेशों में उन आर्थिक नियमों को लागू करवाना, जिनकी वर्षों से अवहेलना हो रही थी।
          ग्रेट ब्रिटेन और उपनिवेशवासियों के बीच अनबन 1763 और 1773 के दशक में शुरू हुयी। ब्रिटेन ने ग्रेनविल (1764-65) और टाउनशेण्ड (1767 ई-) एक्ट्रस बनाया जिसमें कई उपाय शामिल थे और जिनका उद्देश्य धन उगाहना और औपनिवेशिक प्रशासन को चुस्त बनाना था। ब्रिटिश सरकार ने अलेघनी पार क्षेत्रें में अधिवास बन्द करा दिया अनेक आयातित मालों और व्यावसायिक दस्तावेजों पर कर लगाया और औपनिवेशिक व्यवसाय की तुलना में ब्रिटिश व्यवसाय को वरीयता प्रदान करने के लिए कदम उठाए। उपनिवेशवासियों के इन सारे उपायों में सबसे घृणित स्टाम्प कर और चाय कर (टाउन्शेण्ड एक्ट्रस द्वारा आयातित चाय पर लगाया गया कर) थे। उपनिवेशवासियों ने बायकाट, उत्तेजक भाषणों, हिंसा और विरोध सभाओं, जैसे स्टाम्प एक्ट कांग्रेस द्वारा इन दोनों करों का विरोध किया।
          औपनिवेशिक विरोध के सामने ब्रिटेन ने कुछ नियमों को रद्द कर दिया, परन्तु उपनिवेशों पर नियंत्रण को कसने की अपनी सामान्य नीति को जारी रखा। 1768 ई- तक उसने अमेरिका में सेना भेज दी थी और अपने अधिकारियों को वह अमेरिकी सम्पत्ति जब्त करने का आदेश दे दिया जिससे ब्रिटिश कानून का उल्लंघन होता था।
          1773 ई- के बाद निरन्तर झगड़ा एक संकट की ओर तेज गति से अग्रसर हुआ। बोस्टन ‘इण्डियन्स’ के व्यवहार से क्रुद्ध होकर, जिन्होंने ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के चाय से लदे एक जहाज को बर्बाद कर दिया था, ब्रिटिश सरकार ने ‘इनटोलेरेबल एक्ट्रस’ पास किया। इस कानून ने बोस्टन के बंदरगाह को बन्द कर दिया। अब अमेरिकियों को पहले की अपेक्षा अधिक विश्वास हो गया कि ब्रिटेन उन्हें दूसरे दर्जें का नागरिक मानता है।
          अब उग्रवादियों, जिनका नेता सेमुअल एडम्स था, के साथ अनेक रंगरूट भर्ती हो गए। अशांत स्थिति पर विचार करने के लिए 1774 ई- में बुलाया गया, प्रथम महाद्वीपीय अधिवेशन ने एक निर्भीक प्रस्ताव पारित करके एक नयी मनोवृत्ति को अभिव्यक्त किया। इसने इनटोलेरेबल ऐक्ट्रस को अवैध घोषित किया तथा बताया कि संसद ने व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकारों का उल्लंघन किया। उपनिवेश्वासियों की दलील में ‘प्राकृतिक अधिकारों’ का अधिकाधिक उल्लेख महत्वपूर्ण था। यह बताता था कि अनेक उपनिवेशवासी अंग्रेजी कानून से श्रेष्ठ प्राकृतिक नियमों में विश्वास करते हैं। यह इस बात का भी द्योतक था कि अगर अंग्रेजी कानून प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन करता है तो उन्हें अंग्रेजी कानून के विरूद्ध विद्रोह करने का अधिकार है। इनका नारा था फ्प्रतिनिधित्व के बिना कर नहींय् अर्थात उस ब्रिटिश संसद जिसमें अमेरिका का कोई प्रतिनिधि नहीं है। उसे अमेरिकी उपनिवेश पर कर लगाने का कोई अधिकार भी नहीं है।
          दूसरी ओर, ग्रेट ब्रिटेन उपनिवेश्वासियों को कोई छूट देने को तैयार नहीं था। वह उन्हें सबक सिखाना चाहता था। अतः ब्रिटेन और उपनिवेश धीरे-धीरे युद्ध की ओर प्रवृत्त हुए। अप्रैल, 1775 में लेक्सिगटन और कांकर्ड में हुई मुठभेड़ के साथ युद्ध की शुरूआत हुई। मई, 175 में स्वतंत्रता की घोषणा के लिए तैयार लोगों के नेतृत्व में द्वितीय महाद्वीपीय कांग्रेस ने पहले से ही शुरू हो चुके युद्ध को संगठित करने के लिए कदम उठाया और जार्ज वाशिंगटन को अमेरिकी सेना का कमाण्ड सौंप दिया।
शुरू में औपनिवेशिक जनमत का पूरा समर्थन नेताओं को प्राप्त नहीं था, लेकिन जब युद्ध शुरू हो गया तब जनमत तेजी से नेताओं के साथ हो गया। सारा अमेरिका स्वतंत्रता के नारों से गूंज उठा। राजतंत्र और उसकी बुराइयों पर थॉमस पेन के उत्तेजक प्रहार और ब्रिटिश लिप्सा की उसकी कटु आलोचना ने असंख्य अमेरिकियों को अन्तिम कदम उठाने के लिए उत्तेजित कर दिया।
          स्वतंत्रता के समर्थन में लोकप्रिय मनोभाव ने अन्तिम रूप से अपना प्रभाव तब दिखाया जब कई उपनिवेशों ने द्वितीय महाद्वीपीय कांग्रेस के अपने प्रतिनिधिमंडल को ब्रिटेन से संबंध विच्छे करने की हिदायत दी। जुलाई 4, 1776 को कांग्रेस ने एक उग्र सुधारवादी नेता थोमस जेफरसन की कृति ‘स्वतंत्रता की घोषणा’ जारी की। जॉन लॉक और प्रबुद्धवार के यूरोपीय शिष्यों के राजनीतिक दर्शन पर आधारित इसकी भव्य प्रस्तावना ने प्राकृतिक अधिकारों तथा अनुबन्ध पर आधारित सरकार के सिद्धांतों पर जोर दिया।
          स्वतंत्रता की घोषणा ने इस संघर्ष को कानूनी ढंग से स्थापित सत्ता के विरूद्ध मात्र विद्रोह से ऊपर उठा दिया। इसने अमेरिकियों के संघर्ष को सभी प्रबुद्ध लोगों का संघर्ष बना दिया। इसने न केवल 1776 ई- के प्रश्नों को स्पष्ट किया, बल्कि भावी पीढ़ी को उन मौलिक अधिकारों और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा दी जो किसी भी सरकार की सत्ता के बाहर होती है।
घटनाएं
          शक्तिशाली ब्रिटेन के सामने उनका प्रयास निराशाजनक लग रहा था, परन्तु कमजोर नेतृत्व, दूरी और दूसरे जगह फंसे रहने के कारण ब्रिटेन का यह लाभ व्यर्थ साबित हुआ। अमेरिकियों की मुख्य समस्या आपसी फूट पर विजय पाना था। कई राजभक्तों या टोरियों ने ब्रिटेन के विरूद्ध युद्ध का अनुमोदिन नहीं किया था। नयी सरकार क्या रास्ता अपनाएगी, इस पर देशभक्तों में भी मतभेद था। परन्तु स्वतंत्रता के नाम पर ये सारे मतभेद समाप्त हो गए।
जब 1775 ई- में युद्ध की शुरूआत हुई उस समय ब्रिटेन युद्ध के लिए तैयार नहीं था और उसे कुमुक इकट्ठा करने के लिए बोस्टन से पीछे हटना पड़ा। इस घटना को अमेरिकियों ने विजय माना। जुलाई, 1776 तक न्यूयार्क को अड्डा बनाकर ब्रिटेन आक्रमण करने के लिए तैयार था। साल के अन्त में वाशिंगटन ट्रेण्टन और प्रिंसटन पर आक्रमण करने में सफल रहा, लेकिन ये सफलताएं अमेरिकियों के मनोबल को बनाए रखने मे महत्वपूर्ण साबित हुआ।
          सारगोटा की सफलता ने फ्रांस को विश्वास दिला दिया कि अमेरिका की सफलता की संभावना है। 1778 ई- में फ्रांस और अमेरिकियों के बीच विधिवत् एक सन्धि हुई और फ्रांस ने आवश्यक धन, जहाज और सेना भेजना शुरू किया। सरागोटा की घटना और फ्रांस की प्रतिबद्धता के फलस्वरूप अन्य यूरोपीय शक्तियों ने अमेरिका के प्रति अधिकाधिक मित्रता और ब्रिटेन के प्रति शत्रुता दिखाना शुरू किया।
          1777 ई- के बाद अमेरिका में युद्ध काफी बड़े क्षेत्र में फैल गया। ब्रिटिश फिलाडेलफिया से पीछे हट गए और न्यूयार्क में भारी सेना केन्द्रित की। 1781 ई- तक ब्रिटेन इस युद्ध को समाप्त करने के लिए चिन्तित हो उठा था जिसने सारी दुनिया में उसकी शक्ति को चुनौती दे रखी थी। शान्ति-वार्ता पेरिस में सम्पन्न हुई। बेन्जामिन फ्रैंकलिन के नेतृत्व में भेजे गये अमेरिकी प्रतिनिधिमण्डल को फ्रांसीसी नेतृत्व को मानने और ब्रिटेन के साथ अलग सन्धि नहीं करने की हिदायत दी गयी थी। फ्रांसीसी नीयत को भांपकर अमेरिकी प्रतिनिधियों ने उन हिदायतों की अवहेलना की और ब्रिटेन के साथ अलग सन्धि कर ली। 1783 ई- के पेरिस शान्ति संधि के अनुसार ब्रिटेन ने अमेरिका की स्वतंत्रता को मान्यता दे दी और मिसीसीपी के पूरब ग्रेट लेक्स से स्पेनी फ्रलोरिडा तक का सारा क्षेत्र से सौंप दिया। अमेरिकी राष्ट्र ने नया जीवन शुरू करने के लिए एक शानदार विजय प्राप्त की।
अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम का परिणाम और महत्व
          पेरिस की सन्धि के द्वारा पहले के तेरह उपनिवेशों को संप्रभु एवं स्वतंत्र संयुक्त राज्य अमेरिका के रूप में मान्यता मिली। अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम का महत्व सन्धि-शर्तों से कहीं अधिक है। सचमुच में, यह कई दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है-
1-       ब्रिटेन ने अपने सबसे धनी आबादीवाला उपनिवेश खो दिया और महानता की संभावनाओं वाला यूरोपीय उद्गम का एक स्वतंत्र देश अटलाण्टिक पार उदित हुआ।
2-       चूंकि अमेरिकी क्रांति एक तरह से वाणिज्यवादी प्रतिबन्धों के विरूद्ध एक विद्रोह था, इसलिए इसने एडम स्मिथ के लैसेज-फेयर के सिद्धांत को मजबूत किया और वाणिज्यवादी विचारधारा पर गहरा आघात किया। इस क्रांति ने यह स्पष्ट कर दिया कि जब दूसरे उपनिवेश भी समर्थ और धनी बन जायेंगे तो वे पके नाशपाती की तरह मातृ-वृक्ष से टूटकर अलग हो जायेंगे और स्वतंत्र हो जायेंगे।
3-       फ्रांस ने सप्तवर्षीय युद्ध में अपनी हार का आंशिक बदला लिया, परंतु यह बदला उसने भारी कीमत देकर लिया। भारी खर्च के कारण पूर्णतः अस्त-व्यस्त हो गयी। अभी तक जो अर्थव्यवस्था कठिन थी अब असामान्य हो गयी।
4-       ब्रिटेन की हार का दोष राजा जार्ज तृतीय और उसके मंत्रियों पर मढ़ा गया। निरंकुश राजा बनने का जार्ज तृतीय का प्रयास इसी असफलता के कारण विफल हो गया। काफी हद तक अमेरिकी और फ्रांसीसी सफलता ने ब्रिटेन में सीमित राजतंत्र और राजनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखने में मदद की।
5-       अमरिकी क्रांति ने राजनीतिक अभिनव परिवर्तनों की एक श्रृंखला प्रारंभ की जो आगामी वर्षों में काफी महत्वपूर्ण साबित हुई।
6-       अमेरिकी क्रांति के आदर्शों और अनुभवों का प्रभाव अन्य देशों पर भी पड़ा। लगभग तुरंत ही उनका असर फ्रांस पर अत्यन्त महत्वपूर्ण रूप से दिखायी पड़ा।
-- अमेरीकी गृहयुद्ध --

अमरीकी स्वतंत्रता संग्राम में ही गृहयुद्ध के बीज निहित थे। कुछ इतिहासकार दास प्रथा को गृहयुद्ध के लिए जिम्मेदार मानते हैं तथा कुछ इतिहासकार यह मानते हैं तथा इतिहासकार यह मानते हैं कि अब्राहम लिंकन के कारण ही यह घटित हुआ।

  •  अमरीका का विकास इस प्रकार हो रहा था कि उत्तर और दक्षिण के राज्यों में अंतर बढ़ता जा रहा था। उत्तर और दक्षिण के आर्थिक दृष्टिकोण एक दूसरे से बिल्कुल ही भिन्न थे। दक्षिण एक कृषि प्रधान देश था तो उत्तर एक उद्योग प्रधान और शहरी समाज था। दोनों खण्डों में भिन्न प्रकार की श्रम प्रणालियाँ थीं। जहाँ दक्षिण की अर्थव्यवस्था मुख्यतः दासों पर निर्भर करती थी वहाँ उत्तर की अर्थव्यवस्था, मुक्त श्रमिकों पर निर्भर थी। सामाजिक क्षेत्र में भी दोनों खंडों के बीच विषमता आ गई थी। दक्षिणी राज्यों का सामाजिक आधार दास प्रथा पर निर्भर था और उसके विपरीत उत्तरी समाज बिल्कुल ही उदार था। उत्तर में न केवल गुलाम अप्रासंगिक हो गए थे, साथ ही वे दास प्रथा को जनतंत्र के लिए कलंक भी समझने लगे थे।
  •   पूर्व के काल में मेसोन-डिक्सोन रेखा को उत्तर एवं दक्षिण के बीच एक विभाजन रेखा के रूप में जाना जाता था। जब अमरीका का पश्चिमी विस्तार प्रारंभ हुआ, उत्तर एवं दक्षिणी दोनों खण्डों ने पश्चिमी क्षेत्रें में अपनी-अपनी श्रम प्रणालियों को स्थापित करना चाहा। यह मुद्दा गंभीर इसलिए हो जाता था कि दास राज्यों की संख्या में वृद्धि हो जाने से व्यवस्थापिका में दास राज्यों का वर्चस्व बढ़ जाने का खतरा था। यह विवाद मिसौरी समझौता (1820) से सुलझाने का प्रयास किया गया।

  •   1846 में दास प्रथा का प्रश्न पुनः तब उपस्थित हो गया जब अमरीकी संघ में कैलिफोर्निया के विलय का मुद्दा सामने आया। दक्षिण चाहता था कि कैलिफोर्निया को एक दास राज्य के रूप में सम्मिलित करना चाहता था। जब दक्षिणी राज्यों ने इस पर विरोध किया तो उन्हें संतुष्ठ करने के लिए एक कड़ा ‘भगोड़ा दास कानून’ (1850) लाया गया। इस कानून के तहत उत्तर की ओर फरार दासों को उनके स्वामियों को हर कीमत पर लौटा देना था। उत्तरी राज्यों ने विरोध किया क्योंकि वे भगोड़ों दासों को उनके स्वामियों को हर कीमत पर लौटा देना था। उत्तरी राज्यों ने विरोध किया क्योंकि वे भगोड़ों दासों को शरण देते थे। इस कानून ने श्रीमती हैरियट स्टोवे को ‘अंकल टाम्स केबिन’ नामक उपन्यास लिखने को प्रेरणा दी। इस उपन्यास में दासों की स्थिति का ऐसा मर्मस्पर्शी वर्णन था कि लोगों में दास प्रथा के प्रति घृणा व्याप्त हो गई।
  •  प्रबुद्ध लोगों ने भी दास प्रथा के विरुद्ध माहौल बनाना शुरू कर दिया था। कवि लांगफेलों की प्रसिद्ध कविता ‘स्लेब्सड्रीम’ संवेदनशील लोगों के रोंगटे खड़े कर देने वाला था। एक अमरीकी विचारक एमर्सन ने दास प्रथा के विरुद्ध लिखना प्रारंभ किया। हजारों दास विरोधी संगठनों की स्थापना भी हो गई थी।
  •  1854 के ‘केन्सस नेब्रास्का अधिनियम’ ने विवाद को और गहरा कर दिया। इस अधिनियम के अनुसार, केन्सस एवं नेब्रास्का क्षेत्रें के दास प्रश्न वहाँ के निवासियों द्वारा ही सुलझाया जाना था। इसने मिसौरी समझौते को भंग कर दिया।
  •    उत्तर और दक्षिण के बीच तनाव को बढ़ाने में ड्रेड स्कॉट के मुकदमें ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह मुकदमा डेªड स्कॉट नामक एक दास से संबंधित था जिसने अपनी मुक्ति के लिए अमरीका के सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी।
  •  1860 के चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी के अब्राहम िंलकन के जीत से स्थिति और गंभीर हो गई। लिंकन ने दास प्रथा की आलोचना की थी। रिपब्लिकन पार्टी स्वतंत्र श्रम विचारधारा में विश्वास रखती थी। लिंकन की जीत दक्षिण के राज्यों के लिए एक अशुभ संकेत था। उन्हें लगने लगा कि यह जीत उनके हितों की रक्षा नहीं कर पायेगा।
  •  अब तनाव निर्णायक दौर में पहुँच गया था। विरोध की पहल कैरोलिना राज्य ने की। लिंकन के शपथ लेते ही दक्षिण के सात राज्यों ने अमरिकी संघ से अलग होने की घोषणा कर दी। दक्षिणी राज्यों ने एक महासंघ बनना दिया और डेविड जेफरसन को अध्यक्ष चुन लिया गया।
  •  लिंकन अमरीका की अखंडता को हर कीमत पर बनाये रखने के लिए इच्छुक थे। संघ की एकता की हर कीमत पर रक्षा करने की घोषणा के साथ गृहयुद्ध आरंभ हो गया।

अमरीकी गृहयुद्ध के लिए दास प्रथा कहां तक उत्तरदायी है? - यह विवाद एक अरसे से चला आ रहा है कि अमरीकी गृहयुद्ध के लिए दास प्रथा कहां तक उत्तरदायी है।
  •   कुछ इतिहासकार तो इसे मौलिक प्रश्न मानते हैं। इनका मानना है कि अगर दासता का प्रश्न न होता तो संभवतः युद्ध छिड़ता ही नहीं। 1819 के पश्चात अमरीका में दास प्रथा को लेकर ही उत्तरी और दक्षिणी भागों के बीच तनाव उत्पन्न हुआ था।
  •   लेकिन इतिहासकारों का आधुनिक मत यह है कि अमरीकी गृहयुद्ध कई कारणों से हुआ था। दास प्रथा की समस्या तो एक सतही कारण था जो वस्तुतः अमरीका के उत्तरी एवं दक्षिण भागों के मौलिक सामाजिक आर्थिक भिन्नताओं को केवल प्रतिबिम्बित करता था। यह गृहयुद्ध वस्तुतः दो सामाजिक-आर्थिक पद्धतियों का टकराव था।
क्या गृहयुद्ध अमरीकी संविधान के विभिन्न व्याख्याओं के कारण हुआ था?

  •  कुछ इतिहासकार यह मानते हैं कि गृहयुद्ध राजनीतिक कारणों से हुआ था।
  •  उत्तरी राज्य एक अति केन्द्रीयकृत और शक्तिशाली राष्ट्रीय राज्य कायम करना चाहते थे जिसके अधीन अमरीका का कोई भी प्रान्त अलग होने की बात ही नहीं कर सके।
  •  दक्षिण के राज्य स्वायत्तता के समर्थक थे इनके अनुसार, अमरीकी संघ स्वतंत्र सत्तायुक्त राज्यों का एक परिसंघ था। अतः हर अमरीकी राज्य को यह वैधानिक अधिकार था कि वह जिस समय चाहे संघ से अलग हो जाये।
गृहयुद्ध के दौरान क्या हुआ?

  • शुरुआत में, जहाँ दक्षिण शासन इसे अपना जीवन-मरण का प्रश्न बना रहे थे, लिंकन आत्म-विश्वास के कारण अपना सब कुछ नहीं झोंक रहे थे।
  •  लेकिन लिंकन ने अपनी कुटनीतिक कुशलता से दक्षिणी राज्यों का विदेशों से संबंध नहंी बनने दिया। यूरोप के राष्ट्रों ने इसे गुलामी और आजादी के बीच का युद्ध समझा और सबने उत्तर का ही समर्थन किया। धीरे-धीरे दक्षिण के राज्यों का नैतिक पलड़ा हल्का पड़ने लगा।
  •  लिंकन ने पूरे अमरीका में दास प्रथा के उन्मुलन की घोषणा की और दासों को फौज में भर्ती होने का आह्नान किया। लाखों दासों ने इसे स्वीकार किया। इनके फौन में भर्ती हो जाने से युद्ध का रुख बदलने लगा।
  • अंत में, दक्षिण राज्यों में पराजय के साथ गृहयुद्ध समाप्त हुआ। पेन्सिल्वेनिया, विक्सवर्ग, एटलाण्टा आदि के संघर्ष में उत्तरी सेनाओं की विजय हुई। दक्षिण को सेनाओं के सेनापति जनरल ली ने ग्राण्ट के आगे आत्म समपर्ण कर दिया।
  •  लिंकन दूसरी बार राष्ट्रपति चुने गये। परन्तु 14 अप्रैल 1865 को उनकी हत्या कर दी गई।
अमरीका गृहयुद्ध की प्रमुख लड़ाईयाँ

1-       सुन्टर के किले का युद्ध (1861)

2-       शीलोह का युद्ध (1862)

3-       गेरीसवर्ग का युद्ध (1867)

4-       विक्सवर्ग का युद्ध (1863)

5-       एटलाण्डा का युद्ध (1864)

6-       एपोमाटोक्स स्टेशन और कोर्ट हाउस का युद्ध (1865)

क्या अमरीकी गृहयुद्ध आवश्यक था?
  •  कुछ इतिहासकार अमरीकी गृहयुद्ध को आवश्यक मानते हैं क्योंकि इससे बहुत ऐसे सकारात्मक कदम उठाये गए जिससे राष्ट्र और मजबूत हो गया। ऐसा कहा जाता है कि दास प्रथा के उन्मुलन के लिए, युद्ध जैसा कदम आवश्यक हो गया था। दक्षिण ने दास प्रथा के बारे में समझौता करने से इनकार कर दिया था। यह युद्ध तो अमरीका के लिए वरदान साबित हुआ, औद्योगिक विकास तेजी से होने लगा।
  •  लेकिन कुछ इतिहासकार ये प्रश्न भी करते हैं कि क्या हमें ऐसे युद्ध का अभिषेक करना चाहिए जिसने लाखों अमरीकी नागरिकों को या तो अपंग बना दिया या मार डाला। इस खूनी संघर्ष में लाखों लोग मारे गये थे और हजारों बेघर हो गये थे। एलसन ने तो युद्ध का कुल खर्च दस अरब डालर बताया है। अनुमान किया गया है कि इस युद्ध में उत्तरी अमरीका के 3 लाख 60 हजार तथा दक्षिणी अमरीका के 2 लाख 50 हजार व्यक्तियों की मौत हुई।
  •  क्या जन धन को इतनी हानि मात्र दासता को समाप्त करने के लिए आवश्यकत थी?
गृहयुद्ध के परिणाम

अमरीकी गृहयुद्ध के परिणाम न केवल अमरीका के लिए बल्कि विश्व इतिहास के लिए निर्णायक रहे।

  •  इसके फलस्वरूप अमरीकी राष्ट्र दो खण्डों में विभक्त होने से बच गया। युद्ध ने अमरीका के सामने एक चुनौती रख दी थी। इसका अंत कर वास्तव में एक संयुक्त राज्य बन गया।
  •  इस गृहयुद्ध ने लम्बे समय से चले आ रहे प्रांतीय एवं संघीय राज्यों के अधिकारों के विवाद को सुलझा दिया। इसने इस संवेधानिक प्रश्न को हल कर दिया कि राज्यों को संघ से अलग होने का अधिकार नहंी है। इसने राष्ट्रीय एकता कीरक्षा की।
  •   14वें और 15वें संशोधनों द्वारा काले लोगों को भी मताधिकार दिया गया। इस तरह, कम सेकम संवैधानिक रूप से एक सर्वहितकारी गणतंत्र की शुरूआत हो गई।

अमरीकी गृहयुद्ध

  •  सामाजिक मूल्यों में भी परिवर्तन हुआ। एक आदर्श की जीत हुई थी। दासों के मुक्ति से समाज में स्वतंत्रता एवं गतिशीलता बढ़ी। बहुमत ने रंगभेद त्याग दिया। कालों के प्रति दृष्टिकोण बदला।
  •  आर्थिक जीवन का कायाकल्प हो गया। तेजी से औद्योगिकरण शुरू हुआ। संचार और परिवहन का विस्तार हुआ। तेजी से नगरीकरण शुरू हुआ। नगरों की संख्या में सात गुणा वृद्धि हुई।
  •   कम्पनी नियंत्रित पूंजीवाद की शुरूआत हुई। कारनेगी और राकफेलर परिवारों ने क्रमशः इस्पात और तेल उद्योग के विकास में निर्णायक योगदान दिया। विलयन एवं समेकन की प्रक्रिया बड़े स्तरों पर होने लगी। विशालकाय निगमों की स्थापना हुई। व्यावसायिक प्रबंध व्यवस्था की शुरूआत हुई।
  • खेती अब हाथों से नहीं बल्कि यंत्रें से होने लगी। मशीनों के बढ़ते उपयोग से कृषि क्षेत्र में भी उत्पादन तेजी से बढ़ने लगा। अनाज का निर्यात अब संभव था।
  • कुछ इतिहासकार मानते हैं कि इस युद्ध से आधुनिक रणनीति आधारित युद्धों की शुरूआत होती है। कहते हैं, कि यह प्रथम युद्ध था जिसमें बख्तबंद युद्ध पोतों ने संघर्ष किया, व्यापक रूप से तोपखाने तथा गोला बारुद का प्रयोग किया गया इत्यादि।
  •  इस युद्ध के बाद अब्राहम लिंकन द्वारा दी गयी प्रजातंत्र की परिभाषा ने एक नई आशा प्रदान की। इन्होंने कहा फ्जनता की, जनता द्वारा, जनता के लिए सरकार।य्
अमेरिकी संविधान

          अमेरिकी क्रांति और इसके सहवर्ती अंतर्राष्ट्रीय युद्ध से लोकप्रिय संप्रभुता और सफल क्रांति पर आधारित संयुक्त राज्य अमेरिका का स्वतंत्र राज्य के रूप में उदय हुआ। मात्र इसके उद्भव ने इस राष्ट्र को निरंकुश राजतंत्र के लिए एक डरावना उदाहरण और पीड़ित लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बना दिया। क्रांति के दौरान और फिर बाद में भी संयुक्त अमेरिका ने महत्वपूर्ण राजनीतिक आदर्शों की श्रृंखला का दृष्टान्त सामने रखा। चार शब्दों में इसका सारांश प्रस्तुत किया जा सकता है- गणतंत्रवाद, जनतंत्रवाद, संघवाद और संविधानवाद।

          प्राचीन यूनान और रोम, इटालियन नगर राज्यों और स्विट्जरलैण्ड में पहले भी गणतंत्र थे। परंतु, संयुक्त राज्य अमेरिका इन उदाहरणों से काफी बड़ा था, इतना बड़ा कि इसे प्रतिनिधि सरकार की एक जटिल प्रणाली विकसित करनी पड़ी। थोमस पेन के राजतंत्रविरोधी नारों और जार्ज तृतीय के प्रति उसकी आपत्तियों अधिकांश अमेरिकियों को यह विश्वास दिला दिया था कि राजाओं के दिन अब लद चुके है। जब नया संविधान बना तो यह पूर्णतया गणतंत्रवादी था। हर राज्य में भी गणतंत्रीय सरकार की स्थापना की गई।

          शुरू में राज्य व्यवस्थापिका- जिसने औपनिवेशिक व्यवस्थापिका का स्थान लिया था- बहुत जनतांत्रिक नहीं थी। शुरू में धीरे-धीरे परंतु बाद में तेजीसे मताधिकार और पद के लिए संपत्ति-योग्यता और धार्मिक असमर्थता को एक के बाद दूसरे राज्य में समाप्त कर दिया गया।

          संयुक्त राज्य अमेरिका पहला व्यापक, सावधानीपूर्वक एवं सोच-समझ कर बनाए गए संघवाद का उदाहरण था। ‘संप्रभु राज्यों’ से बना हुआ यह संप्रभु राष्ट्र अपने आप में एक विरेाधाभास था। इसने स्थानीय और राष्ट्रीय हितों में समन्वय स्थापित करने का रास्ता दिखाया। इसने दिखाया कि परस्पर विरोधी लोगों और अलग-अलग स्वार्थों को किस तरह सामान्य हित के लिए एक सरकार के अंदर लाया जा सकता है।

          1787 में फिलाडेलफिया में पुराने संघशासन के प्रावधानों से उत्पन्न अंतर्राज्यीय विवादों का समाधान करने और एक शक्तिशाली केन्द्रीय सरकार की स्थापना की युक्ति निकालने के लिए जार्ज वाशिंगटन की अध्यक्षता में सम्मेलन बुलाया गया, संघीय संविधान पूरे राष्ट्र के लिए निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा बनाया और लागू किया गया पहला संविधान था। यह कहा जा सकता है कि इसने अपनी-अपनी सरकारों को निर्मित करने के विभिन्न देशों के अनुभवों, अलिखित ब्रिटिश संविधान के लचीलेपन के अनुभव और हाब्स से जेफरसन तक के सैकड़ों विचारकों के लेखों को एक लिखित संविधान में केंद्रीभूत एवं एकत्रित किया।

          1789 ई- में लागू किए गए अमेरिकी संविधान ने न केवल कई महत्वपूर्ण राजनीतिक आदर्शों- गणतंत्रवाद, सीमित सरकार, शक्ति के पृथक्करण, नियंत्रण और संतुलन, प्रतिनिधि व्यवस्थापिकाओं को प्रतिस्थापित किया, बल्कि यह अपने आप में भी अत्यन्त महत्व का एक आदर्श है। इसके बाद क्रांति या अन्य तरीके से स्थापित लगभग हर राष्ट्र ने संविधान बनाने और फिर जनता से इसकी संपुष्टि प्राप्त करने की कोशिश की। 1789 ई- के तुरंत बाद संविधान में दूसरा अमेरिकी अभिनव परिवर्तन हुआ, क्योंकि दिसम्बर, 1791 में पहले दस संशोधन लागू करने की घोषणा की गई। कुल मिलाकर उन्होंने सरकार से प्रत्येक नागरिक की रक्षा के लिए एक ‘बिल ऑफ राइट्स’ का संस्थापन किया। इससे विधि-प्रशासन, चर्च और राज्य के पृथक्करण, भाषण, प्रेस आवेदन और व्यवस्थापिका की गारंटी मिली।

          अमेरिका के उदाहरण का महत्व इस कारण भी बढ़ गया, क्योंकि शुरू से ही इस सरकार ने कारगर ढंग से काम करना शुरू किया और उपुर्यक्त आदर्शों को लागू किया। शुरू से ही यह स्पष्ट हो गया कि निर्भीक अमेरिकी प्रयोग में असाधारण जीवन-शक्ति है।